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‘यौन सुख बढ़ाने’ के लिए FGM? सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान गरमाया माहौल

महिलाओं के खतना पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, वकील ने कहा- यौन सुख बढ़ाने के लिए है FGM, भड़के जस्टिस

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भारत में महिलाओं के खतना यानी फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली। इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई के दौरान अदालत में उस समय माहौल गरमा गया जब एक वकील ने दावा किया कि यह प्रक्रिया “महिलाओं के यौन सुख को बढ़ाने” के उद्देश्य से की जाती है। इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कड़ी नाराजगी जताई और सवाल उठाया कि क्या किसी महिला की शारीरिक स्वतंत्रता और गरिमा के साथ ऐसा व्यवहार उचित ठहराया जा सकता है।

क्या है FGM या महिलाओं का खतना?

FGM यानी Female Genital Mutilation एक ऐसी प्रथा है जिसमें महिलाओं या लड़कियों के जननांगों के किसी हिस्से को काटा या क्षतिग्रस्त किया जाता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर कम उम्र की बच्चियों पर की जाती है। दुनिया के कई देशों में इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन माना गया है और इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है।

FGM यानी Female Genital Mutilation एक ऐसी प्रथा है जिसमें महिलाओं या लड़कियों के जननांगों के किसी हिस्से को काटा या क्षतिग्रस्त किया जाता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर कम उम्र की बच्चियों पर की जाती है। दुनिया के कई देशों में इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन माना गया है और इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है।

भारत में यह प्रथा मुख्य रूप से दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ हिस्सों में “खफ्ज़” नाम से प्रचलित बताई जाती है। इसे धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में पेश किया जाता है, जबकि कई महिला अधिकार संगठनों का कहना है कि यह महिलाओं के शरीर और उनकी स्वतंत्रता पर नियंत्रण का तरीका है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई बहस?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि FGM महिलाओं के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालता है। यह न सिर्फ शारीरिक पीड़ा देता है, बल्कि महिलाओं के आत्मसम्मान और स्वतंत्रता को भी प्रभावित करता है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि FGM महिलाओं के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालता है। यह न सिर्फ शारीरिक पीड़ा देता है, बल्कि महिलाओं के आत्मसम्मान और स्वतंत्रता को भी प्रभावित करता है।
दूसरी ओर, एक पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि यह प्रथा महिलाओं के यौन जीवन को नियंत्रित करने या उसे बेहतर बनाने से जुड़ी सांस्कृतिक मान्यता का हिस्सा है। इसी दौरान “यौन सुख बढ़ाने” वाली टिप्पणी सामने आई, जिस पर कोर्ट ने सख्त प्रतिक्रिया दी।

जस्टिस ने कहा कि यदि किसी महिला की सहमति के बिना उसके शरीर पर स्थायी असर डाला जाता है, तो यह गंभीर संवैधानिक प्रश्न पैदा करता है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या धार्मिक परंपरा के नाम पर किसी बच्ची के मौलिक अधिकारों से समझौता किया जा सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की क्या राय है?

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विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के अनुसार FGM से कई तरह की गंभीर समस्याएं हो सकती हैं, जैसे:

  • अत्यधिक दर्द और रक्तस्राव
  • संक्रमण का खतरा
  • मानसिक आघात और डर
  • भविष्य में प्रसव संबंधी समस्याएं
  • यौन स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर

विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया का कोई वैज्ञानिक या चिकित्सकीय लाभ साबित नहीं हुआ है।

महिला अधिकार संगठनों की मांग

महिला अधिकार कार्यकर्ता लंबे समय से भारत में FGM पर स्पष्ट कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि बच्चियों की सुरक्षा और उनके शारीरिक अधिकारों की रक्षा के लिए इस प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

कई सामाजिक संगठनों ने अदालत में कहा कि यह केवल धार्मिक स्वतंत्रता का मामला नहीं है, बल्कि बच्चों और महिलाओं के मानवाधिकारों से जुड़ा विषय है।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम मौलिक अधिकार

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा को संविधान से ऊपर रखा जा सकता है। सुप्रीम Court लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि भारत का संविधान हर नागरिक को गरिमा, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

अदालत अब इस मामले में विभिन्न पक्षों की दलीलों को सुन रही है और आने वाले समय में इसका फैसला महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक प्रथाओं के बीच संतुलन तय करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

निष्कर्ष

महिलाओं के खतना का मुद्दा केवल एक धार्मिक परंपरा का विवाद नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा, स्वास्थ्य और अधिकारों से जुड़ा बड़ा सामाजिक प्रश्न बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस ने इस संवेदनशील विषय को फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब सभी की नजर अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है, जो आने वाले समय में इस प्रथा के भविष्य को तय कर सकता है।

 


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