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निकाह-हलाला के नाम पर यौन उत्पीड़न को सही नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

 

निकाह-हलाला के नाम पर यौन उत्पीड़न को सही नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक अत्यंत संवेदनशील मामले में आरोपियों की याचिकाएँ खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि निकाह-हलाला, बहुविवाह या व्यक्तिगत (Personal) कानूनों की आड़ लेकर यौन अपराधों को वैध नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि भारतीय आपराधिक कानून के सामने पर्सनल लॉ अपराध का बचाव नहीं बन सकता और प्रथम दृष्टया मामला गहन जांच का है।


Nikah Halala case Allahabad High Court symbolic image showing court, gavel and justice on sexual exploitation issue.



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यह मामला क्यों ऐतिहासिक माना जा रहा है?

यह केवल "निकाह-हलाला" पर टिप्पणी नहीं है।

असल में अदालत ने तीन महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए—

1.     Personal Law अपराध के लिए ढाल नहीं बन सकता।

2.     महिला की गरिमा और सहमति धार्मिक प्रथा से ऊपर संवैधानिक मूल्य हैं।

3.     एफआईआर को शुरुआती चरण में रद्द करना उचित नहीं, जब प्रथम दृष्टया गंभीर अपराध दिखाई दे रहे हों।


पूरा घटनाक्रम (Chronology)

2015

  1. पीड़िता की उम्र लगभग 15 वर्ष थी।
  2. उसी समय उसका निकाह कराया गया।
  3. नाबालिग होने के कारण मामला अपने आप में गंभीर कानूनी प्रश्न खड़ा करता है।

2016

पति ने कथित रूप से तीन तलाक दिया।

कुछ समय बाद दोबारा शादी की इच्छा जताई गई।

यहीं से पूरा विवाद शुरू होता है।

आरोप है कि—

  1. लड़की को हलाला का वास्तविक अर्थ नहीं बताया गया।
  2. मौलाना के साथ कथित हलाला कराया गया।
  3. इसी दौरान उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए।

2017

दोबारा पहले पति से निकाह कराया गया।

कुछ वर्ष बाद एक बेटी भी हुई।

लेकिन बाद में फिर तलाक दिया गया।


2025

सबसे गंभीर आरोप यहीं सामने आता है।

जब पति की दूसरी पत्नी से संतान नहीं हुई तो कथित रूप से पीड़िता को फिर वापस बुलाया गया।

उसे बताया गया—

अब दोबारा साथ रहने के लिए "डबल हलाला" करना होगा।

एफआईआर के अनुसार—

  1. पति के भाइयों और अन्य आरोपियों ने कथित तौर पर "डबल हलाला" के नाम पर सामूहिक दुष्कर्म किया।
  2. बाद में एक कथित फर्जी निकाह भी कराया गया।

आरोपियों ने हाईकोर्ट में क्या कहा?

आरोपियों ने अदालत से कहा—

  1. एफआईआर रद्द की जाए।
  2. कुछ लोगों की भूमिका केवल निकाह पढ़ाने या गवाह बनने तक सीमित थी।
  3. गिरफ्तारी पर रोक लगाई जाए।

उनका तर्क था कि मामला धार्मिक प्रक्रिया से जुड़ा है।


हाईकोर्ट ने क्या कहा?

यहीं इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं।

1. मामला "आत्मा को झकझोरने वाला"

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्य—

"आत्मा को झकझोर देने वाले हैं।"

कोर्ट ने माना कि यह मामला समाज के उस हिस्से की तस्वीर पेश करता है जो समानता, निजता और व्यक्तिगत गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों से बहुत दूर है।


2. Personal Law अपराध का बचाव नहीं

कोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी—

यदि किसी महिला के साथ बलात्कार, यौन उत्पीड़न या अन्य आपराधिक कृत्य हुआ है, तो आरोपी यह नहीं कह सकता कि उसने Personal Law का पालन किया।

अर्थात—

धार्मिक प्रथा भारतीय आपराधिक कानून से ऊपर नहीं है।


3. यह केवल धार्मिक विवाद नहीं, Criminal Law का मामला है

कोर्ट ने कहा—

जब अपराध की बात आती है—

  1. IPC/BNS
  2. POCSO
  3. आपराधिक प्रक्रिया

इनका पालन होगा।

धार्मिक प्रथा अपराध को वैध नहीं बना सकती।

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4. FIR क्यों रद्द नहीं हुई?

हाईकोर्ट ने कहा—

  1. जांच अभी शुरुआती चरण में है।
  2. प्रथम दृष्टया सभी आरोप गंभीर हैं।
  3. पूरे घटनाक्रम की गहराई से जांच आवश्यक है।

इसलिए एफआईआर समाप्त नहीं की जा सकती।


कोर्ट ने "साजिश" की बात क्यों कही?

कोर्ट ने आरोपियों की यह दलील स्वीकार नहीं की कि कुछ लोग केवल निकाह पढ़ा रहे थे।

अदालत ने कहा—

पूरा घटनाक्रम प्रथम दृष्टया एक सुनियोजित साजिश जैसा प्रतीत होता है।

इसीलिए सभी की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।


POCSO का महत्व

मामले में पीड़िता के नाबालिग होने का आरोप महत्वपूर्ण है।

हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि यदि कथित घटनाएँ उस समय हुईं जब पीड़िता 18 वर्ष से कम थी, तो POCSO Act जैसे विशेष कानून लागू हो सकते हैं और पर्सनल लॉ उनका बचाव नहीं बन सकता। अदालत ने इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया।

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इस फैसले का व्यापक प्रभाव

यह आदेश अंतिम दोषसिद्धि (conviction) नहीं है, बल्कि जांच जारी रखने और एफआईआर रद्द न करने से संबंधित है। फिर भी इसके कुछ महत्वपूर्ण संदेश हैं:

  1. धार्मिक प्रथाओं के नाम पर कथित यौन अपराधों की न्यायिक जांच से छूट नहीं मिलेगी।
  2. महिला की सहमति, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जाएगी।
  3. पर्सनल लॉ और आपराधिक कानून के टकराव में, अपराध संबंधी मामलों में आपराधिक कानून लागू होगा।
  4. अदालतें प्रथम दृष्टया गंभीर आरोपों वाले मामलों में शुरुआती स्तर पर हस्तक्षेप करने से बच सकती हैं।

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किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?

पत्रकारिता की दृष्टि से यह कहना महत्वपूर्ण है कि:

  1. यह अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि आरोपियों की याचिकाएँ खारिज करने और जांच जारी रखने का आदेश है।
  2. एफआईआर में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं।
  3. दोष सिद्ध होना या न होना ट्रायल और साक्ष्यों के आधार पर तय होगा।

अंत में: 

यह मामला केवल निकाह-हलाला पर बहस नहीं है। इसका केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या किसी धार्मिक या व्यक्तिगत कानून की व्याख्या का उपयोग कथित यौन अपराधों के बचाव में किया जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। अदालत ने संकेत दिया कि जहाँ महिला की गरिमा, स्वतंत्र सहमति और भारतीय आपराधिक कानून का प्रश्न हो, वहाँ किसी भी पर्सनल लॉ का सहारा लेकर कथित अपराध को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।

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